Wednesday, August 5, 2020
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अख्तरुल ईमान को सेक्युलर पार्टियों के गठबंधन में स्थान क्यों नहीं

अख्तरुल ईमान बिहार की राजनीति में बेहद चर्चित नाम है। पूर्व विधायक रहे अख्तरुल ईमान सीमांचल के कद्दावर नेता माने जाते हैं। अब इनकी पहचान बिल्कुल अलग है, ये ओवैसी की पार्टी एम्आईएम् के बिहार प्रदेश अध्यक्ष हैं और अपनी बेबाकी से प्रदेश का ध्यान आकर्षित किए हुए हैं।
जब मनमोहन सिंह की सरकार केंद्र में थी तो ये पार्टी उनकी घटक दल थी, उसके बाद ये पार्टी देश के दूसरे भागों में सक्रीय होकर आकर्षण का केन्द्र बनने की जद्दोजहद कर रही है।
जहां एक तरफ बिहार का विपक्षी खेमा महागठबन्धन बनाने में जुटा है और अख्तरुल ईमान की अगुवाई वाले इस दल को अछूत मानकर दूरी बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा की नीतियों की कटु आलोचना के बावजूद भी ये दल सेक्यूलर कहे जाने वाले सभी दलों द्वारा अलग थलग किए जाने से अपनी अलग राह तय करने की कोशिश में जुट गया है। वैसे मेरी अपनी मान्यता है कि राजनीति में कोई अछूत नहीं होता।संसदीय लोकतंत्र में कब किसकी कैसे और कहां ज़रूरत पड़ जाए कोई नहीं जानता।

हद तो तब हो जाती है, जब राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम जैसे दलों को गठबन्धन में इसलिए जगह मिलती है कि वे अपनी अपनी बिरादरी के वोटों के थोक भाव के विक्रेता है जबकि अख्तरुल ईमान को भाजपा का एजेंट बताने में जुटे सेक्यूलर दल उन्हें दरकिनार कर उनके हिस्से के थोक मत पर अपना पुश्तैनी हक मानते हैं। ऐसी विपरीत परिस्थिति में बिहार का मुस्लिम समाज भ्रम की स्थिति में है। आज भी मुस्लिम समाज के अधिकतर लोग भाजपा को हराने की सियासत करते हैं. जिनका झुकाव सवभविक रूप से महागठबन्धन की तरफ है, जबकि एक वर्ग ऐसा भी है जो बिहार में अख्तरुल ईमान और उनके जांबाज़ युवा सिपहसालार आदिल हसन आज़ाद में अपनी कयादत देखता है। ऐसे में जदयू छोड़ ओवैसी का दामन थामने वाले पूर्व विधायक अख्तरुल ईमान और उनकी टीम सीमांचल में आप्शन बन सकती है, जबकि बाकी जगहों पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास करेगी.

लेकिन मेरा इससे कोई लेना देना नहीं है कि कौन जीते और कौन हारे। क्योंकि मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि सत्ता और विपक्ष दोनों दिशाहीन हैं और पूरी तरह पूंजी से सत्ता और फिर सत्ता से पूंजी का खेल जारी है. किसी के पास कोई रोड मैप नहीं है, जिसके आधर पर पलायन, बेरोज़गारी, अशिक्षा का समाधान संभव हो। लेकिन मेरा सवाल राजनीतिक छुआ छूत पर बढ़ते टकराव के समाधान पर ज़रूर है। इस संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी के भाषण को सुनें, देखें और समझने परखने का प्रयास करें ताकि सभी दलों को एक दूसरे को अछूत कहने की परम्परा समाप्त हो और हम विभिन्न विचारों के मानने के बावजूद मिलकर राष्ट्र निर्माण में टीम इंडिया के रूप में अपनी अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करें।

सादात अनवर
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