Sunday, April 11, 2021
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एक शायरा — एक ग़ज़ल

देते तो हो जवाब मगर बेरुख़ी के साथ
क्यूं खेल कर रहे हो मिरी ज़िंदगी के साथ

आहट पे तेरी दौड़ के दरवाज़ा खोलना
कटती है मेरी रात इसी दिल्लगी के साथ

खामोशियों का तेरी है ये भी तो इंतक़ाम
घंटो मैं बात करती हूँ इक अजनबी के साथ

उस के ही इंतज़ार में सदियां गुज़ार दीं
बरसों से घर में रहती हुँ जिस आदमी के साथ

गर हो सके तो दिल से रिहा कर दो आज तुम
ख्वाबों से भी निकाल दो मुझको खुशी के साथ

कल तक जो मेरे लम्हों का मालिक था ए ‘ सबा ‘
मुश्किल है वक़्त कटना अब तो उसी के साथ

सबा अज़ीज़
दिल्ली , भारत

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