Tuesday, May 11, 2021
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एक शायर — एक ग़ज़ल

हूर हो या परी नहीं चलेगी
कह दिया ना कोई नहीं चलेगी

तु मुझे चाहिये मुझे बस तू
दूसरी तीसरी नहीं चलेगी

अब तो सहरा भी टोकने लगा है
इतनी वहशत तिरी नहीं चलेगी

तुम चले जाओगे , चले जाओ
क्या मिरी ज़िंदगी नहीं चलेगी

यार तलवार चल रही है यहाँ
इस जगह शायरी नहीं चलेगी

एक ज़ंजीर ने लिपट के कहा
अब से आवारगी नहीं चलेगी

सर से पानी गुज़रने वाला है
भाई अब खामुशी नहीं चलेगी

इश्क़ है तो हमारे सर माथे
इश्क़ में दिल्लगी नहीं चलेगी

खुर्शीद तलब

बोकारो , झारखंड , भारत

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