Thursday, July 2, 2020
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क्या सरकार पत्रकारों से डरती है?

पिछले दिनों में जिस प्रकार देश भर में पत्रकारों को प्रताड़ित किया गया है वह देश और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरा है।

डॉ. यामीन अंसारी

कहा जाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता न केवल लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, बल्कि यही लोकतंत्र है। यही कारण है कि सभ्य समाज में लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को अविभाज्य माना जाता है, क्योंकि प्रेस के स्वतंत्र होने पर ही वह सरकार को जवाबदेह ठहरा सकेगी। और जब देश की पत्रकारिता स्वतंत्र रूप से सरकार से सवाल करेगी और उसकी जवाबदेही तय करेगी तो इससे सरकार की कार्य़ प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और एक आदर्श लोकतंत्र का निर्माण होगा, लेकिन दुर्भाग्य से भारत समेत दुनिया के अधिकतर देशों में आज ऐसा नहीं हो रहा है। आज भी पत्रकारिता पूरी तरह से आज़ाद नहीं हुई और निष्पक्ष व कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को जनता तक सच्चाई पहुंचाने की क़ीमत अपनी जान देकर, मुकदमों का सामना करके या सलाखों के पीछे पहुंच कर चुकानी पड़ती है।

हम देखते हैं कि न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में पत्रकारों पर दवाव बनाने के लिए शासक और शासक वर्ग द्वारा पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है। यदि हम केवल भारत की ही बात करें, तो दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता पर भारत की पोज़ीशन पहले ही ख़राब थी, जो और अधिक खराब हो रही है। 2009 में भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 105वें स्थान पर था, लेकिन पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर विदआउट बॉर्डर्स की पिछली रिपोर्ट में हम 180 देशों की सूची में 142 वें स्थान पर आ गए हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में न केवल प्रेस की स्वतंत्रता का लगातार उल्लंघन किया गया, बल्कि पुलिस ने पत्रकारों के विरुद्ध हिंसात्मक कार्रवाइयां भी की हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसे पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर पूरे मंसूबे के साथ नफरत फैलाई गई, जिन्होंने हुक्मरानों के खिलाफ कुछ भी लिखा या कहा था। लिहाज़ा हाल के दिनों में पत्रकारों पर जिस तरह से शिकंजा कसने का प्रयास किया गया है, उससे देश की छवि सुधरेगी नहीं, बल्कि और भी बिगड़ जाएगी। हाल ही में विनोद दुआ, सिद्धार्थ वर्धराजन, सुप्रिया शर्मा जैसे जाने-माने और निष्पक्ष पत्रकारों और कई कश्मीरी पत्रकारों के खिलाफ मुक़दमे किए गए हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मशहूर चेहरे पुण्य प्रसून वाजपेयी और अभिसार शर्मा जैसे पत्रकारों की आवाज़ को दबाने का प्रयास किया गया था, जो चिंताजनक है। छोटे बड़े शहरों में स्थानीय पत्रकारों को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है वह तो सामने ही नही आ पाता है। राइट एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप ने तालाबंदी के दौरान 55 पत्रकारों को उत्पीड़ित किए जाने के मामले इकठ्ठा किए, जिन्हें सरकारी नीतियों की आलोचना करने या ज़मीनी तथ्यों को पेश करने पर गंभीर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। इनमें सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में 11, उसके बाद जम्मू और कश्मीर में 6, हिमाचल प्रदेश में 5 हैं, जबकि तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में ऐसे चार केस दर्ज हुए हैं।

ऐसा नहीं है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की समस्या आज ही पैदा हुई है। इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं, पर समय-समय पर इस समस्या को हवा दी जाती रही है। वर्तमान दौर में यह समस्या कुछ अधिक गंभीर हो गई है। वास्तव में प्रेस की स्वतंत्रता का मुद्दा दो प्रकार से पैदा होता है। एक यह है कि सरकार या उसके भक्त पत्रकारिता या पत्रकारों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं और फिर उनमें से या तो कुछ शासकों के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं या उनके प्रवक्ता और दरबारी बन जाते हैं। लोकतंत्र और पत्रकारिता के लिए यह अपने आप में एक समस्या हो जाती है। हम इसे आज विशेष रूप से न्यूज चैनलों पर होने वाली प्रोपेगंडा बहसों में प्रतिदिन देखते हैं। ऐसा लगता है कि ये चैनलों के न्यूज़ स्टूडियो नहीं हैं, बल्कि हुक्मरानों के क़सीदे पढ़ने के दरबार सजे हैं।

इन बहसों के टाइटल बताते हैं कि इनका उद्देश्य किसी समस्या पर चर्चा करना नहीं है, बल्कि शासकों को खुश करना है। पत्रकारों का दूसरा तबक़ा वह है जो सत्ता और धन-बल के सामने समर्पण नहीं करते हैं और पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करते हुए अपने कर्तव्यों के पालन में लगे रहते हैं। साथ ही, यह सरकार को उसकी कमियों और उसकी जिम्मेदारियों से अवगत कराते हैं। समय-समय पर सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं और लोगों के प्रति जवाबदेह रखते हैं। जब यह वर्ग बिना किसी भय और खतरे के अपना काम करता है, तो यहीं से सरकार के लिए एक समस्या पैदा जाती है और वह हुक्मरानों की आख़ों में ख़टकने लगते हैं। शायद पिछले कुछ समय से हमारे देश में यही हो रहा है। इसीलिए, एक के बाद एक राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक और छोटे शहरों से लेकर कस्बों और गांवों तक पत्रकारों को ईमानदारी के साथ काम के लिए दंडित किया जा रहा है और उन्हें उनके कर्तव्यों को निभाने से रोकने के प्रयास हो रहे हैं। यहां कुछ घटनाओं का उल्लेख करना आवश्यक है।

हाल ही में वाराणसी पुलिस ने एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत की बुनियाद पर न्यूज पोर्टल ‘स्क्रॉल.इन’ की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। सुप्रिया शर्मा ने तालाबंदी के दौरान डोमरी गाँव पर एक रिपोर्ट लिखी, जिसे प्रधान मंत्री मोदी ने गोद लिया था। इस दौरान, सुप्रिया शर्मा ने कई लोगों का साक्षात्कार लिया, जिसमें माला देवी नाम की एक महिला भी शामिल थी। वेबसाइट के अनुसार, साक्षात्कार के दौरान माला देवी ने इस रिपोर्टर से कहा कि उनके पास राशन कार्ड नहीं है, जिसके कारण उन्हें खाने-पीने के सामान की कमी का सामना करना पड़ रहा है। पर बाद में पता नहीं किन हालात में माला देवी ने अपना बयान बदल दिया और कहा कि उन्होंने रिपोर्टर को ये बातें नहीं बताईं और रिपोर्टर ने उनकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ाया है। इसलिए माला देवी की शिकायत पर वाराणसी के रामनगर थाने की पुलिस ने 2 जून को एक प्राथमिकी दर्ज की। हालांकि, एफआईआर के बावजूद, सुप्रिया शर्मा अपनी रिपोर्ट पर क़ायम हैं और दावा किया कि उन्होंने तथ्यों से परे कुछ नहीं लिखा है। वेबसाइट के संपादक का नाम भी एफआईआर में दर्ज है।

इससे पहले दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। विनोद दुआ पर झूठी खबरें फैलाने का आरोप था। हिमाचल प्रदेश में उनके खिलाफ दर्ज की गई प्राथमिकी में देशद्रोह की धारा शामिल थी। हालांकि बाद में विशेष सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि उनकी गिरफ्तारी 2 जुलाई तक नहीं हो सकती। इसी प्रकार कुछ माह पहले उत्तर प्रदेश के अयोध्या में वेब पोर्टल ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरधराजन के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई थीं। उन पर आरोप है कि उन्होंने लॉकडाउन के बावजूद अयोध्या में एक कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ की भागीदारी के बारे में अफवाहें फैलाईं। हालांकि द वायर ने यह कहकर जवाब दिया कि मुख्यमंत्री खुद इस कार्यक्रम में सबके सामने शामिल थे इसलिए अफवाहें फैलाने वाली कोई बात ही नहीं है।

योगी सरकार के इस क़दम की देश भर के साढ़े तीन हज़ार से अधिक प्रसिद्ध वकीलों, शिक्षाविदों, अभिनेताओं, कलाकारों और लेखकों ने इसका विरोध किया। इससे पहले कई स्थानीय पत्रकारों के खिलाफ सरकार विरोधी ख़बरें प्रकाशित करने पर प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है। पिछले महीने ही स्थानीय प्रशासन ने यूपी के फतेहपुर जिले के एक पत्रकार अजय भदोरिया के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसके खिलाफ जिले के सभी पत्रकारों ने जल सत्याग्रह शुरू किया था। पिछले साल इसके लिए एक पत्रकार के खिलाफ इसलिए एफआईआर दर्ज की गई थी कि उसने मिर्जापुर में मिड-डे मील में धांधली की ख़बर दी थी। बाद में जिले के डीएम ने एक हास्यास्पद तर्क दिया कि कैसे एक प्रिंट पत्रकार एक वीडियो बना सकता है।

जब पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई के लिए इस तरह के हास्यास्पद तर्क दिए जाते हों, तो यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि किस उद्देश्य के तहत कार्रवाई की जा रही है। यह सब सरकार के लिए इसलिए आसान है क्योंकि पत्रकारों के एक बड़े तबक़े नें अपनी विश्वस्नीयता खो दी है। वह इसलिए क्योंकि मीडिया पर सत्ता और धन का दबाव आज से पहले कभी नहीं था।

( लेखक ” इंक़लाब ” दिल्ली के स्थानीय संपादक और मशहूर पत्रकार हैं )

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