Thursday, July 2, 2020
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घटिया राजनीति ने हमें कितना बदल दिया है, समय मिले तो ज़रूर सोचिए

तहसीन मुनव्वर

कभी मौक़ा मिले तो 2014 या 2013 से भी पहले की अपनी पोस्ट या उन पर कमेंट या किसी और दोस्त की पोस्ट या उन पर कमेंट पढ़िएगा। आप को लगेगा ही नहीं यह आप या वह हैं। दोनों ही खुल कर कुछ भी दिल से लिखते थे बिना दिमाग़ में किसी एजेंडे के और कोई भी बुरा नहीं मानता था बल्कि हंस कर हर बात का उल्टा भी उत्तर दिया जाता था यह सोचे बिना कि सामने वाला इसका कहीं कोई ग़लत अर्थ न निकाल ले। अब आप चाहे सही भी कुछ लिखें लेकिन उसका उल्टा मतलब निकालने वाले दोनों ओर से आजाएंगे। चाहे वह आपकी पोस्ट पर कभी न भटकते हों लेकिन एक पोस्ट आप ने कोई जाने अंजाने ऐसी डाली जिस से किसी का एजेंडा प्रभावित होता हो तब आप देखेंगे कि आप की पोस्ट दो धाराओं की जंग का मैदान बन गई है। आप चाहे बात को सकारात्मकता की ओर ले जाकर ठंडा ही क्यों न करना चाह रहे हों दोनों ओर के सूरमा अपने शब्दों का तीर, कमान में नहीं रखेंगे। ऐसा समय भी आएगा जहां आप को न चाहते हुए भी किसी एक की गोदी में बैठ जाना पड़ेगा।

अपनी पुरानी पोस्ट और कमेंट का पर्यटन कीजिए और सोचिए आप तब अच्छे थे या अब बुरे हो गए हैं? आप पहले बुरे थे या अब और भी बुरे हो गए हैं? सोचिए किन सियासतदानों के लिए एक दूसरे को निशाना बनाने लगते हैं। वह जो या तो जीत से पहले या जीत के बाद कहीं भी किसी से भी मिल जाते हैैं। और आप उन अपनों को जिनके साथ अपना जद्दोजहद का ज़माना बिताया है न जाने क्या क्या कह देते हैं। अपनी पुरानी पोस्ट और कमेन्ट पर ज़रूर जाइएगा। हो सकता है वहां से आप को पुराने वाले आप मिल जाएं जो सोशल मीडिया की भूल भुलैया में न चाहते हुए भी खो गए हैं।

( लेखक दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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