Thursday, September 24, 2020
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चुनावी बजट कितना विफल ।

भाजपा के नेतृत्व वाली एन डी ए सरकार ने अन्त्रिम बजट 2019 पेश कर दिया है कहने को तो यह अन्त्रिम बजट है लेकिन इसकी पूरी कोशिश की गई है कि यह पुर्ण कालिक बजट जैसी हो । भाजपा इसे जनता के हित में और फ़ायदा पहुंचाने वाला बता रही है और इसका ढिढोरा पीट रही है लेकिन जनमानस के लिए इसमें कोई आकर्षण नहीं है और जनता अपने को ठगा हुआ महसूस कर रही है । पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे चुनावी बजट करार दिया है और कहा है कि इसका उद्देश्य चुनाव में फ़ायदा उठाना है ।कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय वित मंत्री पी चितंबरम ने तन्ज कसते हुए कहा कि ये वोट के बदले लाया हुआ जनोपयोगी बजट नहीं बल्कि वोट पाने के लिए लाया गया बजट है ।

बजट की समीक्षा की जाए तो इसमें किसानों का मजाक उड़ गया है , ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें 6000 रुपये सालाना यानी 17 रुपये प्रति दिन दिया गया है । इनकम टेक्स में कोई राहत नहीं मिली है सिर्फ मामुली छेड़छाड़ की गई है , एजुकेशन और नौकरी पर कुछ भी नहीं कहा गया है , इसमें महिलाओं के लिए कुछ भी नहीं है । उन्हें महिला प्रसाधनो और ज्वेलरी पर छूट की आशा थी , सीनियर सिटीज़न्स के लिए भी कुछ भी नहीं है एस सी /एस टी और ओ बी सी के लिए कोई विशिश्ट स्कीम नहीं है । अल्पसंख्यक समुदायो के लिए भी बजट निराशाजनक है ।

कांग्रेस के दिग्गज अहमद पटेल ने कहा है कि 15 लाख का वादा करने के बाद किसानों को 500 रुपये महीना दिया गया है यह नोटबन्दी और जी एस टी से प्रभावित होने वालो के लिए सिर्फ मटर के दाने है । इसमे मनरेगा के लिए कोई अतिरिक्त फ़न्ड नही दिया गया है , गावो के विकास के लिए भी कोई फ़न्ड नही है । स्वच्छ भारत की राशी में 25 प्रतिशत की कमी की गई है , स्किल डेवलपमेन्ट के लिए भी राशी में कमी है , एन एस एस ओ के डेटा को सरकार से मन्ज़ूर कराने की कोई आवश्यकता ही नही होती डेटा से पता चलता है कि बेरोजगारी 45 वर्श के शिखर पर है । हालाकि हर साल 2 करोड़ युवाओ को नौकरी देने का वादा था , सरकार ने देश के युवाओ को छलने का काम किया है ये पकौड़ा नौमिक्स प्रतीत होता है

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव इस बजट को भाजपा के जुमला बाजार में झूठ का बास्केट बताया है , कांग्रेस अध्य्क्ष राहुल गांधी ने इसे आखिरी जुमला बजट की संज्ञा दी है । देखना ये है कि चुनावी दृष्टि कोण से तैयार किया गया इतनी खामियों वाला ये बजट क्या गुल खिलाता है ।

(  लेखक :  शाहीन अहमद सिद्दीक़ी ) 
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