Friday, July 3, 2020
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बिहार का चुनाव आर्थिक न्याय के मुद्दे पर ही होना चाहिए ।

एस. ज़ेड.मलिक

समाज सर्वोपरि है और सत्ता उसके अधीन है, इसलिए सत्ता द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकार में किसी भी प्रकार का बदलाव करना गलत है और सत्ता द्वारा अपने अधिकारों की मर्यादा का उल्लंघन है। इसलिए जो भी सत्ता समाज में नागरिकों के मौलिक अधिकार में परिवर्तन करती है वह सत्ता अवैध है और नागरिकों की स्वतंत्रता का अपहरण कर उसे गुलाम बनाती है। सारी प्राकृतिक संसाधनों पर सबका समान अधिकार एक मौलिक अधिकार है और उसी की रक्षा के लिए संविधान सत्ता नियम और कानून बनाए जाते है। सरकार और समाज सभी को यह बात समझ में आनी चाहिए कि जब प्राकृतिक संसाधनों पर सब का समान अधिकार है तो फिर किसी भी व्यक्ति को सीमाहीन संपत्ति रखने और अनेक लोगों को संपत्ति अधिकार नहीं मिलने को कोई भी व्यक्ति सही नहीं ठहरा सकता। इसलिए न्याय की दृष्टि से हर व्यक्ति को केवल औसत सीमा तक संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार सही है और इससे अधिक संपत्ति रखने पर व्यक्ति को समाज का कर्जदार मानना चाहिए और उसकी औसत सीमा से अधिक संपत्ति पर ब्याज की दर से संपत्ति कर लगाकर उसका वितरण समाज के सभी नागरिकों में बिना किसी भेदभाव के लाभांश के रूप में किया जाना चाहिए।

लेकिन लोकतंत्र के नाम पर वर्तमान व्यवस्था नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन करती है और इसके बदले में उसे वोट देने का अधिकार देकर उसके साथ धोखा करती है. विचारणीय बात यह है कि अर्थव्यवस्था का निर्माण एक व्यक्ति के लाभ के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के न्याय पूर्ण लाभ के लिए होता है। लेकिन वितरण नहीं होने के कारण पूरा लाभ मुट्ठीभर लोगों के पास जा रहा है और यही समाज में भारी आर्थिक असमानता गरीबी शोषण अभाव अन्याय अत्याचार अपराध असंतोष टकराव अनेक विसंगतियां और विकृतियों का मूल कारण है। हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के नाम पर पूरे विश्व समाज के साथ षड्यंत्र हो रहा है। वर्तमान में कोरोना की समस्या भी विश्व राजनीति का दुष्परिणाम है और इसकी रचना जानबूझकर सब का शोषण करने के उद्देश्य से की गई है।

इस समस्या का न्याय पूर्ण और शांतिपूर्ण स्थाई समाधान यह है कि किसी भी व्यक्ति को सीमा हीन संपत्ति का मालिक नहीं माना जाना चाहिए और हर व्यक्ति को समान मौलिक संपत्ति अधिकार जन्म से मृत्यु तक मिलना चाहिए। इसी ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति केवल औसत सीमा तक संपत्ति का मालिक माना जाएगा और इससे अधिक संपत्ति के लिए वह समाज का कर्जदार होगा। इसलिए केवल औसत सीमा से अधिक संपत्ति रखने वालों पर ब्याज की दर से संपत्ति कर लगना चाहिए और बाकी सभी करों को पूरी तरह समाप्त होना चाहिए। औसत सीमा से अधिक संपत्ति पर संपत्ति कर पूरी तरह न्यायपूर्ण है और बाकी सभी कर पूरी तरह अनैतिक अन्याय पूर्ण और समाज के साथ धोखा है। इसलिए सारे टैक्स हटाकर केवल मुट्ठीभर अमीरों पर संपत्ति कर लगाने के लिए शासन को मजबूर कर देना चाहिए। इसका सरलतम उपाय यह है कि “गरीबी रेखा नहीं अमीरी रेखा” बनाई जानी चाहिए जो औसत संपत्ति अधिकार है। जब तक यह मूल अधिकार हर व्यक्ति को कानूनों के द्वारा प्राप्त नहीं होता, उस व्यवस्था को लोकतंत्र कहना समाज को धोखा देना है।

न्याय की दृष्टि से औसत सीमा से अधिक संपत्ति पर संपत्ति कर लगाने से जो राशि प्राप्त होगी वह पूरे समाज का न्याय पूर्ण अतिरिक्त लाभ माना जाना चाहिए और उसका वितरण पूरे समाज में समान रूप से होना चाहिए। उसमें किसी भी प्रकार का कोई फेरबदल या बदलाव समाज की एकता को टुकड़े-टुकड़े करना है और यही उसके साथ सबसे बड़ा षड्यंत्र होता है। आज भी पूरा समाज, सत्ता द्वारा रचे गए इस षड्यंत्र का शिकार है, जिसे लोग समझ नहीं पाते और इसी कारण समाज को गरीबी की भयानक समस्या और अनेक अत्याचारों का शिकार होना पड़ता है। इसलिए यदि आप गरीबी अभाव अन्याय शोषण अपराध असंतोष और अनेक विसंगतियों और विकृतियों से मुक्त समाज की स्थापना करना चाहते हैं तो आपको केवल अमीरी रेखा बनाए जाने की बात करनी चाहिए और उन लोगों को सत्ता देनी चाहिए जो अमीरी रेखा का कानून बनाकर अर्थव्यवस्था से मिलने वाले शुद्ध लाभ को नागरिक भत्ते के रूप में बिना किसी भेदभाव के वितरित करना चाहते हैं।

समाज को यह बात भी समझनी चाहिए कि शासन हमेशा समाज को टुकड़े टुकड़े करना चाहता है ताकि वह मनमानी कर सके और हर विरोध को कुचल सके। आपको इसे समझना चाहिए। लेकिन सभी विद्वानों और समझदार लोगों को यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि अमीरी रेखा का कानून ताकत के बल पर कभी नहीं बनाया जा सकता। बल्कि यह अपना वोट का समर्थन देकर बहुत आसानी से शांतिपूर्वक बनाया जा सकता है। इसलिए यदि आप अमीरी रेखा का कानून शांतिपूर्वक और पूरे समाज के समर्थन से बनाना चाहते हैं तो चुनावों के समय यह सबसे आसानी से किया जा सकता है और सारी व्यवस्था को बदला जा सकता है। इसलिए लोगों को यह बात जरूर समझ में आनी चाहिए कि आने वाले कुछ महीनों के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, और बिहार के वोटरों को अपनी गरीबी खत्म करने के लिए अपने वोट देने के अधिकार का उपयोग अमीरी रेखा बनाने वाली सरकार बनाने के लिए करना चाहिए। ताकि उन्हें देश की अर्थव्यवस्था से मिलने वाले लाभ में हिस्सेदारी मिल सके और उनको गरीबी और गुलामी की अन्याय पूर्ण व्यवस्था से शांति पूर्वक मुक्ति मिल सके।

मैं सभी लोगों को कहना चाहता हूं कि अलग-अलग मांग उठाने से कभी कोई व्यवस्था नहीं बदलती और न्यायपूर्ण बदलाव नहीं होने से कभी सब की गरीबी दूर नहीं हो सकती। किंतु जब एकजुट होकर पूरा समाज अमीरी रेखा बनवाने के लिए अपने वोट का उपयोग करेगा तो उसे बनाने के लिए हर सरकार मजबूर हो जाएगी और हर व्यक्ति को जन्म से मृत्यु तक लाभांश या नागरिक भत्ते को पाने का अधिकार मिल जाएगा और सब की गरीबी पूरी तरह खत्म हो जाएगी। लेकिन मैं समाज के गरीब वर्ग को चेतावनी देना चाहता हूं कि अनेक अमीर लोग और उनके दलाल अलग-अलग तरह के लालच देकर उन्हें समाज से तोड़ने का प्रयास करते हैं ताकि समाज एकजुट न हो सके और सरकार मनमानी कर सके। परंतु इसका नुकसान मुख्य रूप से गरीबों को ही उठाना पड़ता है और उनका अज्ञान ही उनकी गरीबी का कारण बन जाता है।
इसलिए उन्हें अलग-अलग मांग उठाकर मूर्ख बनाने के षड्यंत्र को खत्म कर देना चाहिए।

( लेखक दिल्ली के मशहूर व स्वतन्त्र पत्रकार हैं )

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