Thursday, September 24, 2020
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संविधान की रक्षा के लिए देश की महिलाओं और नागरिकों को और कितना त्याग करना पड़ेगा ?

डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम

विवादास्पद नागरिकता कानूनों के खिलाफ देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। हर शहर और हर गाँव में विरोध हो रहा है, इस मामले में न्यायपालिका की जिम्मेदारी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह विरोध प्रदर्शन सरकार के खिलाफ है और संविधान के अनुसार न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद है। ये विचार आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव डॉ.मोहम्मद मंजूर आलम ने व्यक्त किए। उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि ” क्या सुप्रीम कोर्ट में कोई और नई याचिका दायर नहीं की जाएगी?” क्या सुप्रीम कोर्ट इसे और आगे बढ़ाएगा? क्या पूरे भारत के विरोध के बाद भी इसे टाला जाएगा ?

डॉ.मोहम्मद मंज़ूर आलम ने ये भी कहा कि सरकार की नज़र में जनता की भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है। यह भी सच है कि सरकार लोगों की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। सरकारी अधिकारी प्रदर्शनकारी महिलाओं के खिलाफ शर्मनाक और अपमानजनक बयान दे रहे हैं। क्या हमारे पास जलियावाला बाग और जनरल डायर का इतिहास नहीं है जहां मासूम बच्चों का क़त्ल किया गया था? क्या आजाद भारत में भारतीय लोगों से संविधान की सुरक्षा के लिए इतने बड़े बलिदान की मांग करना सही है ?

जलियाँवाला बाग में महिलाएँ नेतृत्व नहीं कर रही थीं। यदि वे ऐसा करतीं तो शायद इतनी बड़ी घटना नहीं होती। आज, दादी, बहू और बेटियां सभी देश को बचाने और संविधान की रक्षा के लिए सड़कों पर निकली हैं और आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं। यह सब सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की श्रेणी में नहीं आता है। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना, उन्हें विरोध करने से रोकना, उनका मजाक बनाना और उनके लिए शौचालय बंद करना, किस श्रेणी में आता है।

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